श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 42: मारीच का सुवर्णमय मृगरूप धारण करके श्रीराम के आश्रम पर जाना और सीता का उसे देखना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.42.4 
किं नु कर्तुं मया शक्यमेवं त्वयि दुरात्मनि।
एष गच्छाम्यहं तात स्वस्ति तेऽस्तु निशाचर॥ ४॥
 
 
अनुवाद
"परन्तु जब तुम इतनी बुराई पर तुले हो, तो मैं क्या कर सकता हूँ? लो, मैं जाता हूँ। हे मेरे प्रिय रात्रिचर! तुम्हारा कल्याण हो।"॥4॥
 
"But when you have become so bent on evil, what can I do? Here I am leaving. O my dear night-walker! May you be blessed."॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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