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श्लोक 3.41.20  |
निवार्यमाणस्तु मया हितैषिणा
न मृष्यसे वाक्यमिदं निशाचर।
परेतकल्पा हि गतायुषो नरा
हितं न गृह्णन्ति सुहृद्भिरीरितम्॥ २०॥ |
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| अनुवाद |
| 'निश्चर! मैं तुम्हारा हितैषी हूँ, इसीलिए तुम्हें पाप करने से रोक रहा हूँ; परन्तु तुम मेरे वचन सहन नहीं कर सकते। यह सत्य है कि जिनकी आयु समाप्त हो गई है, वे मरते हुए मनुष्य अपने मित्रों द्वारा कहे गए हितकर वचनों को स्वीकार नहीं करते।'॥20॥ |
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| 'Nishchar! I am your well wisher, that is why I am stopping you from committing sins; but you cannot tolerate my words. It is true that those whose life span has come to an end, those dying men do not accept the beneficial words spoken by their friends.'॥ 20॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकचत्वारिंश: सर्ग: ॥ ४ १॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४ १॥ |
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