श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 41: मारीच का रावण को विनाश का भय दिखाकर पुनः समझाना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.41.11 
राज्यं पालयितुं शक्यं न तीक्ष्णेन निशाचर।
न चातिप्रतिकूलेन नाविनीतेन राक्षस॥ ११॥
 
 
अनुवाद
'रात्रि में विचरण करने वाले राक्षस! जो राजा अत्यंत तीक्ष्ण स्वभाव वाला, प्रजा से अत्यंत द्वेष रखने वाला और अभिमानी है, उसके द्वारा राज्य की रक्षा नहीं हो सकती॥11॥
 
'Demons roaming about at night! A kingdom cannot be protected by a king whose nature is very sharp, who is very hostile towards the people and who is arrogant.॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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