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श्लोक 3.40.7  |
एवं मे निश्चिता बुद्धिर्हृदि मारीच विद्यते।
न व्यावर्तयितुं शक्या सेन्द्रैरपि सुरासुरै:॥ ७॥ |
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| अनुवाद |
| 'मारीच! यह मेरे हृदय का दृढ़ विचार है। इन्द्र, अन्य देवता तथा समस्त राक्षस मिलकर भी इसे बदल नहीं सकते। |
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| ‘Maricha! This is the firm thought of my heart. Even Indra and other gods and all the demons together cannot change it. |
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