श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 40: रावण का मारीच को फटकारना और सीताहरण के कार्य में सहायता करने की आज्ञा देना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.40.7 
एवं मे निश्चिता बुद्धिर्हृदि मारीच विद्यते।
न व्यावर्तयितुं शक्या सेन्द्रैरपि सुरासुरै:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'मारीच! यह मेरे हृदय का दृढ़ विचार है। इन्द्र, अन्य देवता तथा समस्त राक्षस मिलकर भी इसे बदल नहीं सकते।
 
‘Maricha! This is the firm thought of my heart. Even Indra and other gods and all the demons together cannot change it.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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