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श्लोक 3.39.9-10  |
सोऽहं वनगतं रामं परिभूय महाबलम्।
तापसोऽयमिति ज्ञात्वा पूर्ववैरमनुस्मरन्॥ ९॥
अभ्यधावं सुसंक्रुद्धस्तीक्ष्णशृङ्गो मृगाकृति:।
जिघांसुरकृतप्रज्ञस्तं प्रहारमनुस्मरन्॥ १०॥ |
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| अनुवाद |
| यह जानकर कि महाबली श्री राम तपस्वी के रूप में वन में आए हैं, मैंने उनकी उपेक्षा की और आगे बढ़ गया। बार-बार पूर्व वैर का स्मरण करके मैं बड़े क्रोध से उनकी ओर दौड़ा। उस समय मेरा रूप मृग के समान था। मेरे सींग बड़े तीखे थे। उनके पूर्व प्रहार का स्मरण करके मैं उन्हें मार डालना चाहता था। मेरी बुद्धि शुद्ध न होने के कारण मैं उनके बल और प्रभाव को लगभग भूल ही गया था॥9-10॥ |
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| Knowing that the mighty Shri Ram had come to the forest as an ascetic, I ignored him and proceeded ahead. Remembering the previous enmity again and again, I ran towards him in great anger. At that time my form was like that of a deer. My horns were very sharp. Remembering his previous attack, I wanted to kill him. Due to my intellect not being pure, I had almost forgotten his power and influence.॥ 9-10॥ |
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