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श्लोक 3.38.33  |
निवार्यमाण: सुहृदा मया भृशं
प्रसह्य सीतां यदि धर्षयिष्यसि।
गमिष्यसि क्षीणबल: सबान्धवो
यमक्षयं रामशरास्तजीवित:॥ ३३॥ |
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| अनुवाद |
| 'मैं तुम्हारा हितैषी और मित्र हूँ। यदि मेरे बार-बार मना करने पर भी तुम हठपूर्वक सीता का हरण करोगे, तो तुम्हारी सारी सेना नष्ट हो जाएगी और तुम श्री राम के बाणों से प्राण खोकर अपने बन्धुओं सहित यमलोक को जाओगे। 33॥ |
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| 'I am your well-wisher and friend. If you stubbornly abduct Sita despite my repeated refusal, then your entire army will be destroyed and you will lose your life to the arrows of Shri Ram and will travel to Yamalok along with your relatives. 33॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टात्रिंश: सर्ग:॥ ३८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३८॥ |
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