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श्लोक 3.38.32  |
कलत्राणि च सौम्यानि मित्रवर्गं तथैव च।
यदीच्छसि चिरं भोक्तुं मा कृथा रामविप्रियम्॥ ३२॥ |
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| अनुवाद |
| 'यदि तुम अपनी सुन्दर पत्नियों और मित्रों का दीर्घकाल तक संग करना चाहते हो, तो भगवान् राम को नाराज मत करो॥ 32॥ |
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| 'If you want to enjoy the company of your beautiful wives and friends for a longer period, then do not offend Lord Rama.॥ 32॥ |
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