श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 38: श्रीराम की शक्ति के विषय में अपना अनुभव बताकर मारीच का रावण को उनका अपराध करने से मना करना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.38.29 
शरजालपरिक्षिप्तामग्निज्वालासमावृताम्।
प्रदग्धभवनां लङ्कां द्रक्ष्यसि त्वमसंशयम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
'निःसंदेह, तुम भी अपने सामने यह दृश्य देखोगे कि लंकापुरी पर बाणों का जाल बिछा हुआ है, वह अग्नि की लपटों से घिरी हुई है और उसका एक-एक घर जलकर राख हो गया है।
 
‘Without doubt, you will also see the scene in front of you that a net of arrows has been spread over Lankapuri. It is surrounded by flames of fire and every single house in it has been burnt to ashes.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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