श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 38: श्रीराम की शक्ति के विषय में अपना अनुभव बताकर मारीच का रावण को उनका अपराध करने से मना करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.38.1 
कदाचिदप्यहं वीर्यात् पर्यटन् पृथिवीमिमाम्।
बलं नागसहस्रस्य धारयन् पर्वतोपम:॥ १॥
 
 
अनुवाद
एक समय मैं अपने पराक्रम पर गर्व करता हुआ पर्वत के समान विशाल शरीर धारण करके पृथ्वी पर विचरण कर रहा था। उस समय मुझमें सहस्त्र हाथियों का बल था॥1॥
 
‘Once upon a time, being proud of my prowess, I was roaming around the earth with a body as big as a mountain. At that time I had the strength of a thousand elephants.॥ 1॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd