|
| |
| |
श्लोक 3.38.1  |
कदाचिदप्यहं वीर्यात् पर्यटन् पृथिवीमिमाम्।
बलं नागसहस्रस्य धारयन् पर्वतोपम:॥ १॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| एक समय मैं अपने पराक्रम पर गर्व करता हुआ पर्वत के समान विशाल शरीर धारण करके पृथ्वी पर विचरण कर रहा था। उस समय मुझमें सहस्त्र हाथियों का बल था॥1॥ |
| |
| ‘Once upon a time, being proud of my prowess, I was roaming around the earth with a body as big as a mountain. At that time I had the strength of a thousand elephants.॥ 1॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|