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श्लोक 3.37.21  |
किमुद्यमं व्यर्थमिमं कृत्वा ते राक्षसाधिप।
दृष्टश्चेत् त्वं रणे तेन तदन्तमुपजीवितम्॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| हे राक्षसराज! इस व्यर्थ प्रयत्न से तुम्हें क्या लाभ होगा? जिस दिन युद्ध में भगवान राम की दृष्टि तुम पर पड़ जाए, उसी दिन अपने जीवन का अंत समझो॥ 21॥ |
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| ‘King of demons! What will you gain by making this futile effort? The day Lord Rama's gaze falls on you in the war, consider that day as the end of your life.॥ 21॥ |
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