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श्लोक 3.36.20  |
ततस्तयोरपाये तु शून्ये सीतां यथासुखम्।
निराबाधो हरिष्यामि राहुश्चन्द्रप्रभामिव॥ २०॥ |
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| अनुवाद |
| "जब वे दोनों तुम्हें पकड़ने के लिए बहुत दूर चले जायेंगे, तब मैं बिना किसी बाधा के निर्जन आश्रम से सीता का उसी प्रकार हर्षपूर्वक हरण कर लूँगा, जैसे राहु चन्द्रमा की प्रभा का हरण कर लेता है।" |
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| "When they both go far away to catch you, then without any hindrance I will abduct Sita from the deserted hermitage as happily as Rahu abducts the radiance of the moon." |
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