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श्लोक 3.33.24  |
इति स्वदोषान् परिकीर्तितांस्तथा
समीक्ष्य बुद्धॺा क्षणदाचरेश्वर:।
धनेन दर्पेण बलेन चान्वितो
विचिन्तयामास चिरं स रावण:॥ २४॥ |
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| अनुवाद |
| शूर्पणखा द्वारा बताये गये दोषों पर बुद्धिपूर्वक विचार करके धन, अभिमान और बल से संपन्न वह निशाचर राक्षस रावण बहुत देर तक गहन चिन्तन और चिन्ता में पड़ा रहा। |
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| Having wisely pondered over the faults pointed out by Shurpanakha, that night-time demon Ravana, endowed with wealth, pride and strength, lay in deep thought and worry for a long time. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रयस्त्रिंश: सर्ग: ॥ ३ ३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३ ३॥ |
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