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श्लोक 3.33.19  |
उपभुक्तं यथा वास: स्रजो वा मृदिता यथा।
एवं राज्यात् परिभ्रष्ट: समर्थोऽपि निरर्थक:॥ १९॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे पुराना कपड़ा या कुचली हुई फूलों की माला दूसरों के उपयोग के योग्य नहीं रहती, वैसे ही राज्य से वंचित राजा शक्तिशाली होने पर भी दूसरों के लिए व्यर्थ है॥19॥ |
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| Just as a worn out cloth or a crushed garland of flowers is not fit for use by others, similarly a king who has lost his kingdom is useless to others even if he is powerful.॥ 19॥ |
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