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श्लोक 3.30.15  |
कालपाशपरिक्षिप्ता भवन्ति पुरुषा हि ये।
कार्याकार्यं न जानन्ति ते निरस्तषडिन्द्रिया:॥ १५॥ |
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| अनुवाद |
| जो लोग मृत्यु के जाल में फँस जाते हैं, उनकी छहों इन्द्रियाँ बेकार हो जाती हैं; इसलिए उन्हें उचित-अनुचित का ज्ञान नहीं रहता।॥15॥ |
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| ‘Those who are caught in the trap of death, their six senses become useless; therefore they lose the knowledge of what is right and what is wrong.’॥ 15॥ |
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