श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 29: श्रीराम का खर को फटकारना तथा खर का भी उन्हें कठोर उत्तर देकर उनके ऊपर गदा का प्रहार करना और श्रीराम द्वारा उस गदा का खण्डन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.29.21 
न तु मामिह तिष्ठन्तं पश्यसि त्वं गदाधरम्।
धराधरमिवाकम्प्यं पर्वतं धातुभिश्चितम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
'क्या तुम नहीं देखते कि मैं तुम्हारे सामने हाथ में गदा लिये खड़ा हूँ, जैसे नाना प्रकार की धातुओं की खानों से भरा हुआ एक ठोस पर्वत, तथा स्थिर मुद्रा में पृथ्वी को थामे हुए हूँ?
 
'Don't you see that I am standing here in front of you with my mace in my hand, like a solid mountain filled with mines of various kinds of metals and holding the earth, with a steady posture?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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