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श्लोक  3.25.29-30 
ते छिन्नशिरस: पेतुश्छिन्नचर्मशरासना:।
सुपर्णवातविक्षिप्ता जगत्यां पादपा यथा॥ २९॥
अवशिष्टाश्च ये तत्र विषण्णास्ते निशाचरा:।
खरमेवाभ्यधावन्त शरणार्थं शराहता:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
सिर, ढाल और धनुष कट जाने पर वे राक्षस उसी प्रकार गिर पड़े, जैसे गरुड़ के पंखों की वायु से नंदनवन के वृक्ष गिर जाते हैं। जो राक्षस बच गए, वे भी श्रीराम के बाणों से आहत होकर शोक में डूब गए और रक्षा के लिए खारक की ओर भागे।
 
After their heads, shields and bows were cut off, those demons fell down like the trees of Nandanvana falling down due to the wind from Garuda's wings. The demons who survived were also hurt by Shri Ram's arrows and were drowned in sorrow and ran to Kharaka for protection.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)