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श्लोक 3.24.4  |
अमी रुधिरधारास्तु विसृजन्ते खरस्वना:।
व्योम्नि मेघा निवर्तन्ते परुषा गर्दभारुणा:॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| गधे के समान धूसर बादल आकाश में इधर-उधर घूम रहे हैं, भयंकर गर्जना कर रहे हैं और रक्त की धाराएँ बहा रहे हैं॥4॥ |
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| ‘The grey clouds resembling donkeys are roaming here and there in the sky, roaring terribly and pouring streams of blood.॥ 4॥ |
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