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श्लोक 3.21.4  |
किमेतच्छ्रोतुमिच्छामि कारणं यत्कृते पुन:।
हा नाथेति विनर्दन्ती सर्पवच्चेष्टसे क्षितौ॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| फिर तुम सर्प के समान भूमि पर लोटते हुए 'हे प्रभु' पुकार क्यों रहे हो? मैं सुनना चाहता हूँ॥4॥ |
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| ‘Then what is the reason that you are rolling on the ground like a snake and crying out ‘Oh Lord’? I want to hear it.॥ 4॥ |
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