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श्लोक 3.21.17-18  |
शूरमानी न शूरस्त्वं मिथ्यारोपितविक्रम:॥ १७॥
अपयाहि जनस्थानात् त्वरित: सहबान्धव:।
जहि त्वं समरे मूढान्यथा तु कुलपांसन॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| तू अपने को वीर तो मानता है, परन्तु तुझमें वीरता नहीं है । तूने अपने ऊपर झूठा वीरता का आरोप लगाया है । मूर्ख ! युद्धस्थल में इन दोनों को मार डाल, अन्यथा अपने कुल को कलंकित कर और अपने भाइयों सहित इस स्थान से तुरंत भाग जा ॥ 17-18॥ |
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| ‘You consider yourself a brave man, but you have no bravery. You have falsely accused yourself of valour. Fool! Kill both of them in the battle field or else bring shame to your clan and flee from this place immediately along with your brothers.॥ 17-18॥ |
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