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श्लोक 3.21.16-17h  |
बुद्धॺाहमनुपश्यामि न त्वं रामस्य संयुगे॥ १६॥
स्थातुं प्रतिमुखे शक्त: सबलोऽपि महारणे। |
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| अनुवाद |
| मैं बार-बार सोचता हूँ कि यद्यपि तुम महायुद्ध में अत्यन्त बलवान हो, फिर भी राम के सामने टिक न सकोगे॥16 1/2॥ |
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| ‘I think again and again that even though you are very strong in the great war, you will not be able to stand against Rama.॥ 16 1/2॥ |
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