श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 2: वन के भीतर श्रीराम, लक्ष्मण और सीता पर विराध का आक्रमण  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.2.23 
अनाथ इव भूतानां नाथस्त्वं वासवोपम:।
मया प्रेष्येण काकुत्स्थ किमर्थं परितप्यसे॥ २३॥
 
 
अनुवाद
'ककुत्स्थकुलभूषण! आप इन्द्र के समान समस्त प्राणियों के स्वामी और रक्षक हैं। जब मैं आपका सेवक हूँ, तब आप अनाथ की भाँति क्यों दुःखी हो रहे हैं?
 
'Kakutsthakulbhushan! You are the master and protector of all living beings like Indra. Why are you feeling distressed like an orphan when I am your servant?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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