श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 14: पञ्चवटी के मार्ग में जटायु का मिलना और श्रीराम को अपना विस्तृत परिचय देना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.14.33 
तस्माज्जातोऽहमरुणात् सम्पातिश्च ममाग्रज:।
जटायुरिति मां विद्धि श्येनीपुत्रमरिंदम॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
'उस विनतानन्दन अरुण से मैं और मेरे बड़े भाई सम्पाती उत्पन्न हुए हैं। हे शत्रु रघुवीर! आप मेरा नाम जटायु समझते हैं। मैं श्येनि (ताम्र की पुत्री जिसका नाम श्येनि बताया गया है, उन्हीं के वंश में उत्पन्न श्येनि मेरी माता थी) का पुत्र हूँ।' 33॥
 
'It was from that Vintanandan Arun that I and my elder brother Sampati were born. Enemy Raghuveer! You understand my name is Jatayu. I am the son of Shyeni (Tamra's daughter who is described as Shyeni, a Shyeni born in her tradition was my mother). 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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