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श्लोक 2.99.5  |
शालायास्त्वग्रतस्तस्या ददर्श भरतस्तदा।
काष्ठानि चावभग्नानि पुष्पाण्यपचितानि च॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| उस समय भरत ने उस कुटिया के सामने होम के लिए एकत्रित की हुई बहुत सी लकड़ियाँ देखीं। साथ ही उन्होंने पूजा के लिए एकत्रित किए हुए पुष्प भी देखे।॥5॥ |
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| At that time Bharata saw many pieces of wood collected for the 'Homa' in front of that hut. Along with that he also saw flowers collected for the puja. ॥ 5॥ |
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