श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 99: भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना, उनकी पर्णशाला देख रोते-रोते चरणों में गिरना, श्रीराम का उन सबको हृदय से लगाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.99.5 
शालायास्त्वग्रतस्तस्या ददर्श भरतस्तदा।
काष्ठानि चावभग्नानि पुष्पाण्यपचितानि च॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उस समय भरत ने उस कुटिया के सामने होम के लिए एकत्रित की हुई बहुत सी लकड़ियाँ देखीं। साथ ही उन्होंने पूजा के लिए एकत्रित किए हुए पुष्प भी देखे।॥5॥
 
At that time Bharata saw many pieces of wood collected for the 'Homa' in front of that hut. Along with that he also saw flowers collected for the puja. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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