श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 99: भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना, उनकी पर्णशाला देख रोते-रोते चरणों में गिरना, श्रीराम का उन सबको हृदय से लगाना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  2.99.37 
इत्येवं विलपन् दीन: प्रस्विन्नमुखपङ्कज:।
पादावप्राप्य रामस्य पपात भरतो रुदन्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार विलाप करते हुए भरत अत्यन्त दुःखी हो गए। उनके मुख पर पसीने की बूँदें झलकने लगीं। वे श्री रामचन्द्र के चरणों तक पहुँचने से पहले ही भूमि पर गिर पड़े।
 
While lamenting in this manner, Bharata became very sad. Drops of sweat began to appear on his face. He fell on the ground before he could reach the feet of Shri Ramchandra. 37.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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