श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 99: भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना, उनकी पर्णशाला देख रोते-रोते चरणों में गिरना, श्रीराम का उन सबको हृदय से लगाना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  2.99.34 
यस्य यज्ञैर्यथादिष्टैर्युक्तो धर्मस्य संचय:।
शरीरक्लेशसम्भूतं स धर्मं परिमार्गते॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
जिनके लिए शास्त्रविहित यज्ञों द्वारा धर्म का संचय करना उचित है, वे अब शरीर को कष्ट देकर प्राप्त होने वाले धर्म की जिज्ञासा कर रहे हैं॥ 34॥
 
'Those for whom it is appropriate to accumulate Dharma by performing the sacrifices prescribed in the scriptures are now inquiring into the Dharma which can be attained by torturing the body.॥ 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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