श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 99: भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना, उनकी पर्णशाला देख रोते-रोते चरणों में गिरना, श्रीराम का उन सबको हृदय से लगाना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  2.99.22 
महारजतवासोभ्यामसिभ्यां च विराजिताम्।
रुक्मबिन्दुविचित्राभ्यां चर्मभ्यां चापि शोभिताम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
सोने की म्यान में रखी दो तलवारें तथा सुनहरे बिन्दुओं से सजी दो विचित्र ढालें ​​भी उस आश्रम की शोभा बढ़ा रही थीं।
 
Two swords kept in golden sheaths and two strange shields decorated with golden dots were also enhancing the beauty of that ashram.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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