श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 99: भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना, उनकी पर्णशाला देख रोते-रोते चरणों में गिरना, श्रीराम का उन सबको हृदय से लगाना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.99.12 
यमेवाधातुमिच्छन्ति तापसा: सततं वने।
तस्यासौ दृश्यते धूम: संकुल: कृष्णवर्त्मन:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
'वन में तपस्वी ऋषिगण जिनकी सदैव पूजा करना चाहते हैं, उन अग्निदेव का घना धुआँ अब दिखाई दे रहा है ॥12॥
 
'The dense smoke of the Agnidev, whom the ascetic sages always want to worship in the forest, is now visible. ॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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