श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 97: श्रीराम का लक्ष्मण के रोष को शान्त करके भरत के सद्भाव का वर्णन करना,लक्ष्मण का लज्जित होना और भरत की सेना का पर्वत के नीचे छावनी डालना  »  श्लोक 9-11
 
 
श्लोक  2.97.9-11 
मन्येऽहमागतोऽयोध्यां भरतो भ्रातृवत्सल:।
मम प्राणै: प्रियतर: कुलधर्ममनुस्मरन्॥ ९॥
श्रुत्वा प्रव्राजितं मां हि जटावल्कलधारिणम्।
जानक्या सहितं वीर त्वया च पुरुषोत्तम॥ १०॥
स्नेहेनाक्रान्तहृदय: शोकेनाकुलितेन्द्रिय:।
द्रष्टुमभ्यागतो ह्येष भरतो नान्यथाऽऽगत:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
'वीर! हे महापुरुष! भरत अपने भाई के बड़े भक्त हैं। वे मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जब भरत ने अयोध्या में आकर सुना कि मैं जटा और छाल धारण करके आपके और जानकी के साथ वन में आया हूँ, तब उनकी इन्द्रियाँ शोक से व्याकुल हो गई हैं और वे गृहस्थ धर्म का विचार करके प्रेमपूर्वक हमसे मिलने आए हैं। भरत के आगमन का इससे बढ़कर और कोई प्रयोजन नहीं हो सकता।॥9-11॥
 
'Valiant! O great man! Bharata is a great devotee of his brother. He is dearer to me than my life. It seems to me that when Bharata came to Ayodhya and heard that I have come to the forest with you and Janaki wearing matted hair and bark, his senses have become restless with grief and after thinking about the family's duty, he has come to meet us with a loving heart. There can be no other purpose of Bharata's arrival than this.॥ 9-11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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