श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 97: श्रीराम का लक्ष्मण के रोष को शान्त करके भरत के सद्भाव का वर्णन करना,लक्ष्मण का लज्जित होना और भरत की सेना का पर्वत के नीचे छावनी डालना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.97.7 
नेयं मम मही सौम्य दुर्लभा सागराम्बरा।
नहीच्छेयमधर्मेण शक्रत्वमपि लक्ष्मण॥ ७॥
 
 
अनुवाद
हे लक्ष्मण! समुद्र से घिरी यह पृथ्वी मेरे लिए दुर्लभ नहीं है, किन्तु मैं पाप करके इन्द्र पद पाने की आकांक्षा भी नहीं कर सकता।
 
'Gentle Lakshmana! This earth surrounded by the ocean is not rare for me, but I cannot even aspire to attain the position of Indra by doing wrong. 7.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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