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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 97: श्रीराम का लक्ष्मण के रोष को शान्त करके भरत के सद्भाव का वर्णन करना,लक्ष्मण का लज्जित होना और भरत की सेना का पर्वत के नीचे छावनी डालना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.97.6 
भ्रातॄणां संग्रहार्थं च सुखार्थं चापि लक्ष्मण।
राज्यमप्यहमिच्छामि सत्येनायुधमालभे॥ ६॥
 
 
अनुवाद
'हे सुमित्रापुत्र! मैं अपने भाइयों के कल्याण और सुख के लिए ही राज्य की कामना करता हूँ और मैं अपने धनुष को छूकर शपथ लेता हूँ कि यह सत्य है।
 
'O son of Sumitra! I desire the kingdom only for the well-being and happiness of my brothers and I swear by touching my bow that this is true.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)