श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 97: श्रीराम का लक्ष्मण के रोष को शान्त करके भरत के सद्भाव का वर्णन करना,लक्ष्मण का लज्जित होना और भरत की सेना का पर्वत के नीचे छावनी डालना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.97.5 
धर्ममर्थं च कामं च पृथिवीं चापि लक्ष्मण।
इच्छामि भवतामर्थे एतत् प्रतिशृणोमि ते॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'लक्ष्मण! मैं तुमसे प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मैं धर्म, अर्थ, काम और पृथ्वी का राज्य तुम लोगों के लिए ही चाहता हूँ।॥5॥
 
'Lakshmana! I tell you with a promise that I want Dharma, Artha, Kama and the kingdom of the earth for you people only. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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