श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 97: श्रीराम का लक्ष्मण के रोष को शान्त करके भरत के सद्भाव का वर्णन करना,लक्ष्मण का लज्जित होना और भरत की सेना का पर्वत के नीचे छावनी डालना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.97.4 
यद् द्रव्यं बान्धवानां वा मित्राणां वा क्षये भवेत्।
नाहं तत् प्रतिगृह्णीयां भक्ष्यान् विषकृतानिव॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'जो धन अपने बन्धु-बान्धवों और मित्रों का नाश करके प्राप्त होता है, वह मिलावटी अन्न के समान सर्वथा त्यागने योग्य है; मैं उसे कभी ग्रहण नहीं करूँगा ॥4॥
 
'The wealth that is gained by destroying one's relatives or friends is worth giving up completely, like adulterated food; I will never accept him. 4॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas