श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 97: श्रीराम का लक्ष्मण के रोष को शान्त करके भरत के सद्भाव का वर्णन करना,लक्ष्मण का लज्जित होना और भरत की सेना का पर्वत के नीचे छावनी डालना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.97.30 
अध्यर्धमिक्ष्वाकुचमूर्योजनं पर्वतस्य ह।
पार्श्वे न्यविशदावृत्य गजवाजिनराकुला॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
उस समय इक्ष्वाकुवंश के राजा की सेना हाथी, घोड़े और मनुष्यों से भरी हुई पर्वत के चारों ओर डेढ़ योजन (छह कोस) भूमि घेरकर डेरा डाले हुए थी।
 
At that time, the army of the King of the Ikshvaku dynasty, filled with elephants, horses and men, had encamped encircling one and a half yojanas (six kos) of land around the mountain.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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