Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 ramayan 2.97.22: अथवा मैं यह सोचता हूँ कि पिता जी हमें सुख भोगने के योग्य समझकर वनवास के कष्टों पर विचार करके हम दोनों को अवश्य ही घर ले जाएँगे॥ 22॥ | ramayan सर्ग 2.97: श्रीराम का लक्ष्मण के रोष को शान्त करके भरत के सद्भाव का वर्णन करना,लक्ष्मण का लज्जित होना और भरत की सेना का पर्वत के नीचे छावनी डालना । ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड । श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अथवा नौ ध्रुवं मन्ये मन्यमान: सुखोचितौ।
वनवासमनुध्याय गृहाय प्रतिनेष्यति॥ २२॥
अनुवाद
अथवा मैं यह सोचता हूँ कि पिता जी हमें सुख भोगने के योग्य समझकर वनवास के कष्टों पर विचार करके हम दोनों को अवश्य ही घर ले जाएँगे॥ 22॥
‘Or I think that considering us worthy of enjoying happiness, father, after considering the hardships of exile, will certainly take us both back home.॥ 22॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥