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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
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सर्ग 97: श्रीराम का लक्ष्मण के रोष को शान्त करके भरत के सद्भाव का वर्णन करना,लक्ष्मण का लज्जित होना और भरत की सेना का पर्वत के नीचे छावनी डालना
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श्लोक 19
श्लोक
2.97.19
तथोक्तो धर्मशीलेन भ्रात्रा तस्य हिते रत:।
लक्ष्मण: प्रविवेशेव स्वानि गात्राणि लज्जया॥ १९॥
अनुवाद
अपने धर्मनिष्ठ भाई की यह बात सुनकर, उसके कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहने वाले लक्ष्मण लज्जा के मारे गश खाकर गिर पड़े॥19॥
On hearing this from his devout brother, Lakshman, who was always ready for his welfare, seemed to sink into his limbs in shame. 19॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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