श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 97: श्रीराम का लक्ष्मण के रोष को शान्त करके भरत के सद्भाव का वर्णन करना,लक्ष्मण का लज्जित होना और भरत की सेना का पर्वत के नीचे छावनी डालना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.97.18 
उच्यमानो हि भरतो मया लक्ष्मण तद्वच:।
राज्यमस्मै प्रयच्छेति बाढमित्येव मंस्यते॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'लक्ष्मण! यदि मैं भरत से कहूँ कि 'तुम उसे राज्य दे दो', तो वह अवश्य ही 'बहुत अच्छा' कहकर मेरी बात मान लेगा॥ 18॥
 
'Lakshmana! If I say to Bharata that 'you should give the kingdom to him', then he will surely agree to my request saying 'very good'.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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