श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 97: श्रीराम का लक्ष्मण के रोष को शान्त करके भरत के सद्भाव का वर्णन करना,लक्ष्मण का लज्जित होना और भरत की सेना का पर्वत के नीचे छावनी डालना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  2.97.16 
कथं नु पुत्रा: पितरं हन्यु: कस्यांचिदापदि।
भ्राता वा भ्रातरं हन्यात् सौमित्रे प्राणमात्मन:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
सुमित्रानंदन! चाहे कितनी ही बड़ी विपत्ति क्यों न हो, पुत्र अपने पिता को कैसे मार सकता है? अथवा भाई अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय भाई को कैसे मार सकता है?॥16॥
 
'Sumitra Nandan! No matter how big the calamity, how can a son kill his father? Or how can a brother kill his brother who is dearer to him than his own life?॥ 16॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas