श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 97: श्रीराम का लक्ष्मण के रोष को शान्त करके भरत के सद्भाव का वर्णन करना,लक्ष्मण का लज्जित होना और भरत की सेना का पर्वत के नीचे छावनी डालना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.97.15 
नहि ते निष्ठुरं वाच्यो भरतो नाप्रियं वच:।
अहं ह्यप्रियमुक्त: स्यां भरतस्याप्रिये कृते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
‘जब भरत आवे, तब तुम उनसे कोई कठोर या अप्रिय बात न कहना। यदि तुम उनसे कोई प्रतिकूल बात कहोगे, तो वह बात मुझसे कही हुई मानी जाएगी।॥15॥
 
‘When Bharata comes, do not say anything harsh or unpleasant to him. If you say anything unfavourable to him, it will be considered as if you have said it to me.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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