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श्लोक 2.97.13  |
प्राप्तकालं यथैषोऽस्मान् भरतो द्रष्टुमर्हति।
अस्मासु मनसाप्येष नाहितं किंचिदाचरेत्॥ १३॥ |
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| अनुवाद |
| भरत का हमसे मिलने आना बिलकुल समय पर हुआ है। वह हमसे मिलने के योग्य है। वह हमारा कुछ अहित करने की कभी कल्पना भी नहीं कर सकता।॥13॥ |
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| ‘Bharat's coming to meet us is absolutely timely. He is worthy of meeting us. He can never even think of doing any harm to us.॥ 13॥ |
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