श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 97: श्रीराम का लक्ष्मण के रोष को शान्त करके भरत के सद्भाव का वर्णन करना,लक्ष्मण का लज्जित होना और भरत की सेना का पर्वत के नीचे छावनी डालना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.97.13 
प्राप्तकालं यथैषोऽस्मान् भरतो द्रष्टुमर्हति।
अस्मासु मनसाप्येष नाहितं किंचिदाचरेत्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
भरत का हमसे मिलने आना बिलकुल समय पर हुआ है। वह हमसे मिलने के योग्य है। वह हमारा कुछ अहित करने की कभी कल्पना भी नहीं कर सकता।॥13॥
 
‘Bharat's coming to meet us is absolutely timely. He is worthy of meeting us. He can never even think of doing any harm to us.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)