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श्लोक 2.96.23  |
सम्प्राप्तोऽयमरिर्वीर भरतो वध्य एव हि।
भरतस्य वधे दोषं नाहं पश्यामि राघव॥ २३॥ |
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| अनुवाद |
| 'वीर रघुनाथजी! यह भरत हमारा शत्रु है और हमारे सामने आया है; अतः इसका वध होना उचित है। मैं भरत को मारने में कोई दोष नहीं देखता॥ 23॥ |
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| 'Valiant Raghunathji! This Bharat is our enemy and has come in front of us; hence he deserves to be killed. I do not see any fault in killing Bharat.॥ 23॥ |
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