श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 96: लक्ष्मण का शाल-वृक्ष पर चढ़कर भरत की सेना को देखना और उनके प्रति अपना रोषपूर्ण उद्गार प्रकट करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.96.17 
सम्पन्नं राज्यमिच्छंस्तु व्यक्तं प्राप्याभिषेचनम्।
आवां हन्तुं समभ्येति कैकेय्या भरत: सुत:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'भैया! निश्चय ही यह कैकेयी का पुत्र भरत है, जो अयोध्या में अभिषेक पाकर अपने राज्य को नाश से मुक्त करने की इच्छा से हम दोनों को मारने के लिए यहाँ आ रहा है॥17॥
 
'Brother! Surely this is Bharat, son of Kaikeyi, who, after being anointed in Ayodhya, is coming here to kill both of us with the desire to make his kingdom free from destruction. 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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