श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 96: लक्ष्मण का शाल-वृक्ष पर चढ़कर भरत की सेना को देखना और उनके प्रति अपना रोषपूर्ण उद्गार प्रकट करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.96.14 
अग्निं संशमयत्वार्य: सीता च भजतां गुहाम्।
सज्यं कुरुष्व चापं च शरांश्च कवचं तथा॥ १४॥
 
 
अनुवाद
आर्य! अब अग्नि बुझा दो (अन्यथा यह सेना धुआँ देखकर यहाँ आ जाएगी); देवी सीता गुफा में जाकर बैठ जाएँ। आप धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएँ, बाण और कवच धारण करें॥14॥
 
‘Arya! Now extinguish the fire (otherwise this army will come here seeing the smoke); Goddess Sita should go and sit in the cave. You should string your bow and wear arrows and armour.’॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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