श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 95: श्रीराम का सीता के प्रति मन्दाकिनी नदी की शोभा का वर्णन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.95.18 
इमां हि रम्यां गजयूथलोडितां
निपीततोयां गजसिंहवानरै:।
सुपुष्पितां पुष्पभरैरलंकृतां
न सोऽस्ति य: स्यान्न गतक्लम: सुखी॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'इस संसार में ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जो उस सुन्दर मंदाकिनी नदी में स्नान करके लज्जा से मुक्त होकर सुखी न हो जाए, जिसका जल हाथियों के समूह मथते हैं, जिसका जल सिंह और बंदर पीते हैं, जिसके तटों पर सुन्दर फूलों से लदे हुए वृक्ष नदी की शोभा बढ़ाते हैं और जो पुष्पगुच्छों से सुसज्जित है।'॥18॥
 
'There is no man in this world who would not be free from shame and be happy after taking a bath in the beautiful river Mandakini, which is churned by herds of elephants and whose water is drunk by lions and monkeys, on whose banks trees laden with beautiful flowers adorn the river and which is decked with bunches of flowers.'॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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