श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 95: श्रीराम का सीता के प्रति मन्दाकिनी नदी की शोभा का वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.95.17 
उपस्पृशंस्त्रिषवणं मधुमूलफलाशन:।
नायोध्यायै न राज्याय स्पृहये च त्वया सह॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'प्रिये! मैं न तो अयोध्या जाना चाहता हूँ और न ही तुम्हारे साथ दिन में तीन बार स्नान करके तथा मीठे फल-मूल खाकर राज्य प्राप्त करना चाहता हूँ॥ 17॥
 
'Dear! I neither wish to go to Ayodhya nor to get the kingdom while bathing with you three times a day and eating sweet fruits and roots.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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