श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 94: श्रीराम का सीता को चित्रकूट की शोभा दिखाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.94.3 
न राज्यभ्रंशनं भद्रे न सुहृद्भिर्विनाभव:।
मनो मे बाधते दृष्ट्वा रमणीयमिमं गिरिम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
(उसने कहा,) 'यद्यपि मैं अपने राज्य से वंचित हो गया हूँ और अपने हितैषी मित्रों से दूर रह रहा हूँ, फिर भी जब मैं इस सुन्दर पर्वत को देखता हूँ, तो मेरे सारे दुःख दूर हो जाते हैं। यहाँ तक कि राज्य का वियोग और मित्रों का वियोग भी मेरे मन को व्यथित नहीं करता।'
 
(He said,) 'Although I have been deprived of my kingdom and have to live away from my well-wishing friends, yet when I look at this beautiful mountain, all my sorrows disappear. Even the absence of my kingdom and the separation from my friends do not trouble my mind.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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