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श्लोक 2.94.27  |
इमं तु कालं वनिते विजह्रिवां-
स्त्वया च सीते सह लक्ष्मणेन।
रतिं प्रपत्स्ये कुलधर्मवर्धिनीं
सतां पथि स्वैर्नियमै: परै: स्थित:॥ २७॥ |
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| अनुवाद |
| 'हे मेरी प्रिय सीते! यदि मैं उत्तम नियमों का पालन करते हुए और सही मार्ग पर रहते हुए तुम्हारे और लक्ष्मण के साथ सुखपूर्वक ये चौदह वर्ष बिताऊँ, तो मुझे वह सुख प्राप्त होगा, जो कुल धर्म को बढ़ाने वाला है।'॥27॥ |
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| "My dear Sita! If I spend these fourteen years happily with you and Lakshman by following the best rules and staying on the right path, then I will get that happiness which will enhance the family's Dharma.'॥ 27॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुर्नवतितम: सर्ग:॥ ९४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९४॥ |
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