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श्लोक 2.94.19  |
इदमेवामृतं प्राहू राज्ञि राजर्षय: परे।
वनवासं भवार्थाय प्रेत्य मे प्रपितामहा:॥ १९॥ |
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| अनुवाद |
| 'रानी! मेरे परदादा मनु आदि श्रेष्ठ राजर्षियों ने नियमपूर्वक किये गये इन वनवासों को अमृत कहा है; इससे शरीर त्यागने के बाद मनुष्य परम कल्याण को प्राप्त होता है। 19॥ |
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| 'Queen! My great grandfather Manu etc. excellent royal sages have called these exiles done as per rules as nectar; Through this one attains ultimate welfare after leaving the body. 19॥ |
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