श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 94: श्रीराम का सीता को चित्रकूट की शोभा दिखाना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.94.18 
वैदेहि रमसे कच्चिच्चित्रकूटे मया सह।
पश्यन्ती विविधान् भावान् मनोवाक्कायसम्मतान्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
‘विदेहकुमारी! क्या तुम मेरे साथ चित्रकूट पर्वत पर मन, वाणी और शरीर को सुख देने वाले विविध विषयों को देखकर आनन्दित होती हो?॥18॥
 
‘Videha Kumari! Do you get pleasure by seeing the various objects which are pleasing to the mind, speech and body along with me on the Chitrakoot mountain?॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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