श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 94: श्रीराम का सीता को चित्रकूट की शोभा दिखाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.94.17 
अनेन वनवासेन मम प्राप्तं फलद्वयम्।
पितुश्चानृण्यता धर्मे भरतस्य प्रियं तथा॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'प्रिये! इस वनवास से मुझे दो लाभ हुए हैं - पहला, धर्मानुसार पिता की आज्ञा का पालन करने का ऋण चुकता हो गया है और दूसरा, मैं अपने भाई भरत का प्रिय हो गया हूँ॥ 17॥
 
'Dear! I have got two benefits from this exile - firstly, the debt of obeying my father's orders according to Dharma has been repaid and secondly, I have become dear to my brother Bharat.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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