श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 94: श्रीराम का सीता को चित्रकूट की शोभा दिखाना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.94.13 
जलप्रपातैरुद्भेदैर्निष्पन्दैश्च क्वचित् क्वचित्।
स्रवद्भिर्भात्ययं शैल: स्रवन्मद इव द्विप:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
कहीं ऊँचे स्थानों से झरने गिर रहे हैं, कहीं भूमि से झरने निकल रहे हैं और कहीं छोटे-छोटे झरने बह रहे हैं। इन सबके कारण यह पर्वत मदमस्त धारा से बहते हुए हाथी के समान शोभायमान हो रहा है॥13॥
 
‘Somewhere there are waterfalls falling from high places, somewhere there are springs emerging from the ground and somewhere there are small sources flowing. Due to all these this mountain looks beautiful like an elephant flowing with a stream of intoxication.॥ 13॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas